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अगर पुलिस FIR दर्ज न करे तो क्या करें? (CrPC 156(3) और नई BNSS 175(3) की पूरी जानकारी)

October 11, 2026

हमारे समाज में आम आदमी का पुलिस स्टेशन (Police Station) जाने का अनुभव कोई बहुत अच्छा नहीं होता। जब कोई व्यक्ति किसी जुर्म का शिकार होता है—चाहे वो कोई धोखाधड़ी (Fraud) हो, मारपीट हो, चोरी हो, या कोई गंभीर अपराध—तो वो सबसे पहले मदद की उम्मीद लेकर पुलिस के पास जाता है।

लेकिन असली परेशानी तब शुरू होती है, जब थाने का मुंशी या SHO साहब साफ़ मना कर देते हैं कि, “भैया, यहाँ कोई FIR (First Information Report) दर्ज नहीं होगी, आप जाइये यहाँ से।” या फिर आपको टरका दिया जाता है कि “जांच चल रही है, बाद में आना।”

ऐसे में एक आम नागरिक सोचता है कि अब वो कहाँ जाए? क्या पुलिस के FIR न लिखने पर इंसाफ के सारे रास्ते बंद हो जाते हैं?

क्या आपके भी कानूनी सवाल हैं? जानें: अगर पुलिस FIR दर्ज न करे तो क्या करें? (CrPC 156(3)) - सम्पूर्ण कानूनी जानकारी एडवोकेट महेश शर्मा (जयपुर) से तुरंत कानूनी सहायता के लिए संपर्क करें। #LegalTips #CriminalLaw

बिल्कुल नहीं! मैं, एडवोकेट महेश शर्मा (Advocate Mahesh Sharma), पिछले 25 से भी ज्यादा सालों से जयपुर और राजस्थान हाई कोर्ट में क्रिमिनल और सिविल मुकदमों (Criminal Law & Civil Litigation) की पैरवी कर रहा हूँ। अपने इतने सालों के एक्सपीरियंस में मैंने ऐसे हजारों केस देखे हैं जहाँ पुलिस ने FIR लिखने से मना कर दिया, लेकिन हमने कोर्ट के जरिये पुलिस को FIR दर्ज करने पर मजबूर कर दिया।

आज के इस ब्लॉग (Legal Guide) में, मैं आपको बिल्कुल आसान और अपनी देसी भाषा में समझाऊंगा कि अगर पुलिस FIR दर्ज न करे तो आपको क्या करना चाहिए (What to do if Police refuses to register FIR)। हम पुरानी CrPC की धारा 156(3) और नए लागू हुए कानून BNSS (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता) की धारा 175(3) दोनों के बारे में बात करेंगे।

सबसे पहले समझें: पुलिस FIR कब दर्ज करती है? (Cognizable vs Non-Cognizable Offence)

आगे की कानूनी लड़ाई समझने से पहले, एक बेसिक चीज समझना बहुत जरुरी है। पुलिस हर छोटे-मोटे मामले में FIR दर्ज करने के लिए बाध्य नहीं है। अपराध दो तरह के होते हैं:

  1. संज्ञेय अपराध (Cognizable Offence): ये गंभीर किस्म के अपराध होते हैं। जैसे – मर्डर, रेप, किडनैपिंग, बड़ी चोरी, डकैती, या गंभीर धोखाधड़ी। ऐसे मामलों में पुलिस को तुरंत FIR दर्ज करनी ही होती है। पुलिस बिना वारंट के गिरफ्तार भी कर सकती है।
  2. असंज्ञेय अपराध (Non-Cognizable Offence/ NCR): ये थोड़े हल्के मामले होते हैं। जैसे – हल्की गाली-गलौज, मामूली कहासुनी, या छोटा-मोटा विवाद। इसमें पुलिस FIR नहीं लिखती, बल्कि NCR (Non-Cognizable Report) काटती है और आपको सीधे कोर्ट (Magistrate) के पास जाने को कहती है।

दिक्कत तब आती है जब अपराध Cognizable (गंभीर) हो, लेकिन फिर भी पुलिस FIR दर्ज न करे। चलिए, अब देखते हैं स्टेप-बाय-स्टेप प्रोसेस कि ऐसे में आपको क्या करना है।

Step 1: पुलिस स्टेशन के प्रभारी (SHO) को लिखित शिकायत दें

अगर आपके साथ कोई क्राइम हुआ है, तो सबसे पहले अपने एरिया के थाने में जाएँ। अगर वो मौखिक (orally) आपकी बात सुनकर FIR नहीं लिख रहे हैं, तो अपनी शिकायत एक कागज पर लिखकर दें। अगर वो शिकायत लेने से भी मना कर दें, तो उसे पुलिस स्टेशन के पते पर रजिस्टर्ड पोस्ट (Registered Speed Post) से भेज दें।

Pro Tip: पोस्ट ऑफिस की रसीद (Tracking slip) अपने पास बहुत संभाल कर रखें, यह आगे कोर्ट में बहुत काम आएगी।

Step 2: जिले के SP / DCP के पास जाएँ (Section 154(3) CrPC / Section 173(4) BNSS)

अगर थाने का थानाधिकारी (SHO) आपकी नहीं सुनता है, तो कानून आपको अगला अधिकार देता है बड़े अफसरों के पास जाने का।

पुराना कानून (CrPC 154(3)): इसके तहत आपको जिले के SP (Superintendent of Police) को अपनी शिकायत भेजनी होती थी।

नया कानून (BNSS 173(4)): नए कानूनों के तहत भी यही प्रावधान है।

चूंकि जयपुर में पुलिस कमिश्नरेट सिस्टम (Commissionerate System) लागू है, इसलिए आपको अपने एरिया के DCP (Deputy Commissioner of Police) या पुलिस कमिश्नर को अपनी पूरी शिकायत स्पीड पोस्ट (Registered Post) से भेजनी है।

अगर SP/DCP को लगता है कि आपके लेटर को पढ़कर कोई सीरियस क्राइम (Cognizable offence) बनता है, तो वो या तो खुद इन्वेस्टिगेशन करेंगे, या नीचे थाने वाले को आर्डर देंगे कि “तुरंत FIR दर्ज करो।”

Step 3: कानूनी ब्रह्मास्त्र – मजिस्ट्रेट के पास शिकायत (CrPC 156(3) / BNSS 175(3))

मान लीजिये आपने थाने के भी चक्कर काट लिए, SP/DCP ऑफिस में भी एप्लीकेशन दे दी, 15-20 दिन निकल गए लेकिन कोई FIR दर्ज नहीं हुई (No Action Taken by Police)। अब क्या करें?

यहीं पर एंट्री होती है एक अच्छे और अनुभवी क्रिमिनल वकील (Best Criminal Lawyer in Jaipur) की और कोर्ट की ताकत की।

जब पुलिस आपकी मदद न करे, तो हम सीधे इलाका मजिस्ट्रेट (Judicial Magistrate) के पास जाते हैं।

क्या है CrPC 156(3) और नया BNSS 175(3)?

पहले हम इसे CrPC (Criminal Procedure Code) की धारा 156(3) के तहत कोर्ट में लगाते थे। अब नए कानून लागू होने के बाद इसे BNSS (Bhartiya Nagarik Suraksha Sanhita) की धारा 175(3) के तहत फाइल किया जाता है।

क्या आपके भी कानूनी सवाल हैं? जानें: अगर पुलिस FIR दर्ज न करे तो क्या करें? (CrPC 156(3)) - सम्पूर्ण कानूनी जानकारी एडवोकेट महेश शर्मा (जयपुर) से तुरंत कानूनी सहायता के लिए संपर्क करें। #LegalTips #CriminalLaw

यह कोर्ट का वो पॉवर है जिसके तहत मजिस्ट्रेट पुलिस स्टेशन के SHO को आर्डर दे सकता है कि, “इस मामले में तुरंत FIR दर्ज करके जांच (Investigation) शुरू करो और कोर्ट में रिपोर्ट पेश करो।”

कोर्ट में 156(3) / 175(3) की प्रक्रिया कैसे चलती है? (Process in Court)

यहाँ अक्सर लोग गलती करते हैं और किसी भी नौसिखिये वकील से फाइल लगवा देते हैं, जो बाद में रिजेक्ट हो जाती है। कोर्ट में इसका एक फिक्स तरीका होता है:

  1. शिकायत की ड्राफ्टिंग: आपका वकील एक बहुत ही स्ट्रोंग क्रिमिनल कंप्लेंट (Complaint) ड्राफ्ट करता है, जिसमें घटना की पूरी जानकारी, तारीख, और पुलिस द्वारा की गई लापरवाही का जिक्र होता है।
  2. सबूत लगाना (Evidence): थाने और DCP को जो स्पीड पोस्ट भेजा था, उसकी रसीदें यहाँ फाइल के साथ लगाई जाती हैं। यह साबित करता है कि आपने पहले पुलिस के पास जाने का नियम (Exhaustion of Police Remedies) फॉलो किया था।
  3. शपथ पत्र (Affidavit): सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court of India) की एक बहुत ही फेमस जजमेंट है— प्रियंका श्रीवास्तव बनाम स्टेट ऑफ़ यूपी (Priyanka Srivastava vs State of UP)। इसके तहत अब यह कम्पलसरी हो गया है कि आप कोर्ट में जो भी एप्लीकेशन 156(3) या 175(3) के तहत लगाएंगे, उसके साथ आपका एक एफिडेविट (शपथ पत्र) लगेगा कि आप जो भी इल्जाम लगा रहे हैं, वो बिल्कुल सच हैं। अगर इल्जाम झूठे निकले, तो शिकायतकर्ता पर भी कार्रवाई हो सकती है।
  4. ATR (Action Taken Report): एप्लीकेशन लगने के बाद मजिस्ट्रेट सीधे FIR का आर्डर नहीं देता। पहले वो पुलिस से एक रिपोर्ट (ATR) मांगता है कि “बताओ पुलिस वालों, तुमने इस मामले में अब तक क्या किया?”
  5. कोर्ट का आर्डर: अगर पुलिस की ATR में लीपापोती होती है और जज साहब को लगता है कि मामला गंभीर है, तो कोर्ट सीधा आदेश निकाल देता है – “FIR Darj Karo”. पुलिस को कोर्ट का आर्डर हर हाल में मानना ही पड़ता है।

Step 4: परिवाद (Private Complaint – Section 200 CrPC / 223 BNSS)

कई बार कोर्ट 156(3) में FIR का आर्डर देने के बजाय, आपके केस को एक प्राइवेट कंप्लेंट (Private Complaint या परिवाद) के रूप में दर्ज कर लेता है।

नए कानून BNSS की धारा 223 (पुरानी CrPC 200) के तहत, मजिस्ट्रेट शिकायतकर्ता (यानी आपको) और आपके गवाहों को कोर्ट में बुलाकर उनके बयान खुद दर्ज करता है। अगर जज को लगता है कि जुर्म हुआ है, तो वो पुलिस के बिना भी सीधा आरोपियों को समन (Summons) या अरेस्ट वारंट (Warrant) जारी कर सकता है।

यानी पुलिस काम न करे, तो कोर्ट खुद उस काम को अपने हाथ में ले लेता है।

जीरो एफआईआर (Zero FIR) का विकल्प: यह क्या है?

कई बार लोग जयपुर में बैठे होते हैं, लेकिन उनके साथ धोखाधड़ी या क्राइम दिल्ली या मुंबई में हो जाता है। ऐसे में जयपुर पुलिस कहती है कि “क्राइम हमारे एरिया में नहीं हुआ, हम FIR नहीं लिखेंगे।”

यहाँ कानून ने आपको Zero FIR (जीरो एफआईआर) का हक दिया है। किसी भी गंभीर अपराध (जैसे महिलाओं के खिलाफ अपराध, मर्डर, एक्सीडेंट) में आप भारत के किसी भी पुलिस स्टेशन में FIR दर्ज करवा सकते हैं। पुलिस उसे ‘जीरो’ नंबर देकर दर्ज करेगी और फिर खुद उस पुलिस स्टेशन को ट्रांसफर करेगी जहाँ घटना हुई थी। ज्यूरिसडिक्शन (Area) का बहाना बनाकर पुलिस FIR लिखने से मना नहीं कर सकती।

राजस्थान में E-FIR (Online FIR Registration)

अगर मामला चोरी (Theft) या डॉक्यूमेंट गुम होने का है, तो राजस्थान पुलिस ने अब ऑनलाइन सुविधा भी दे दी है। आप राजस्थान पुलिस के सिटीजन पोर्टल (Rajasthan Police Citizen Portal) पर जाकर सीधे घर बैठे E-FIR दर्ज कर सकते हैं। इसके लिए थाने जाने की कोई आवश्यकता नहीं है।

पुलिस FIR क्यों दर्ज नहीं करती? (Reasons Behind Police Inaction)

अब आप सोचेंगे कि पुलिस का काम ही FIR लिखना है, फिर वो ऐसा करने से बचती क्यों है? इसके कुछ प्रैक्टिकल कारण हैं:

  • क्राइम रेट का डर: थानों पर ऊपर से प्रेशर होता है कि क्राइम का आंकड़ा कम दिखना चाहिए। ज्यादा FIR मतलब उस इलाके का क्राइम रेट ज्यादा दिखेगा।
  • सिविल मामलों को क्रिमिनल बनाना: कई बार लोग जमीन के विवाद (Land Dispute) या पैसों के लेन-देन (Money Recovery) को क्रिमिनल केस बनाकर प्रेशर डालना चाहते हैं। पुलिस ऐसे मामलों में FIR दर्ज करने से बचती है, क्योंकि ये सिविल नेचर के केस होते हैं।
  • प्रभावशाली लोग: कई बार आरोपी कोई रसूखदार नेता या पैसे वाला व्यक्ति होता है, जिसकी वजह से पुलिस आम आदमी की रिपोर्ट दर्ज नहीं करती।

इन्हीं सब वजहों से आपको एक बेबाक और अनुभवी क्रिमिनल वकील (Experienced Criminal Advocate) की जरूरत पड़ती है जो पुलिस के सामने मजबूती से आपका पक्ष रख सके।

क्यों एक अनुभवी वकील चुनना जरूरी है? (Why Adv Mahesh Sharma?)

कानून की किताबें हर वकील पढ़ता है, लेकिन ‘अदालत का तजुर्बा’ किताबों में नहीं मिलता। जब कोर्ट में 156(3) या 175(3) की बहस (Arguments) होती है, तो पुलिस के सरकारी वकील पूरी कोशिश करते हैं कि आपकी एप्लीकेशन खारिज हो जाए।

अगर आपके वकील को क्रॉस-क्वेश्चनिंग, सुप्रीम कोर्ट की लेटेस्ट रूलिंग (Latest Judgments) और क्रिमिनल ड्राफ्टिंग की गहरी समझ नहीं है, तो आपका केस कमजोर पड़ सकता है।

मैं, एडवोकेट महेश शर्मा, जमवारामगढ़ बार एसोसिएशन (Jamwa Ramgarh Bar Association) में महासचिव और उपाध्यक्ष जैसे जिम्मेदार पदों पर रह चुका हूँ। 25+ सालों में, मैंने धोखाधड़ी (Cheating), चेक बाउंस (Cheque Bounce), JDA विवाद (Property Fraud), और संगीन आपराधिक मामलों (Bail, Trial, FIR Quashing) में हज़ारों क्लाइंट्स को न्याय दिलवाया है।

चाहे मामला सेशन कोर्ट (Sessions Court) का हो या राजस्थान हाई कोर्ट (Rajasthan High Court) का, हम पूरी ताकत और सत्यनिष्ठा के साथ केस लड़ते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

Q1. क्या FIR दर्ज करवाने की कोई फीस होती है?

Ans: बिल्कुल नहीं! पुलिस स्टेशन में FIR दर्ज करवाने की कोई सरकारी फीस नहीं होती है। यह प्रक्रिया पूरी तरह निशुल्क है। अगर कोई पुलिसवाला पैसे मांगता है, तो यह रिश्वत (Corruption) है।

Q2. घटना के कितने दिन बाद तक FIR दर्ज कराई जा सकती है?

Ans: कानून में FIR दर्ज कराने की कोई फिक्स टाइम लिमिट नहीं है। लेकिन, घटना होने के जितनी जल्दी हो सके रिपोर्ट दर्ज करानी चाहिए। अगर देरी (Delay in FIR) होती है, तो कोर्ट में आपको उसका जायज कारण (Reason for delay) बताना पड़ता है।

Q3. अगर कोर्ट (मजिस्ट्रेट) भी 156(3) की एप्लीकेशन ख़ारिज कर दे, तो क्या करें?

Ans: टेंशन लेने की कोई बात नहीं। अगर लोअर कोर्ट आपकी अर्जी ख़ारिज कर देता है, तो हम उस आर्डर के खिलाफ डिस्ट्रिक्ट एंड सेशन कोर्ट (Sessions Court) में रिवीजन (Revision Petition) डाल सकते हैं, या फिर राजस्थान हाई कोर्ट में सीधे याचिका (High Court Writ/Section 482 CrPC / 528 BNSS) दायर कर सकते हैं।

निष्कर्ष (Conclusion)

कानून ने हर नागरिक को न्याय पाने का अधिकार दिया है। अगर पुलिस आपका साथ न दे, तो निराश होकर घर न बैठें। कोर्ट के पास इतनी ताकत है कि वो पुलिस को अपना काम करने पर मजबूर कर सकता है। बस जरूरत है तो सही समय पर सही कानूनी रास्ता चुनने की।

अगर आप भी ऐसे ही किसी कानूनी झमेले में फंसे हैं जहाँ पुलिस आपकी सुन नहीं रही है, या आपके खिलाफ कोई झूठी FIR (Fake FIR) कर दी गई है जिसे आप रद्द (Quash) करवाना चाहते हैं, तो आप तुरंत मुझसे संपर्क कर सकते हैं।

कानूनी सहायता के लिए संपर्क करें:
एडवोकेट महेश शर्मा (Advocate Mahesh Sharma)
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विधिक सलाहकार/अधिवक्ता Advocate Mahesh Sharma || 28 वर्षीय अनुभव 9829262341 || advmaheshsharma.com Head office - E-47, Model Town, Prem Nagar, Agra road, Jaipur, rajasthan (302031) Branch Office - Near Civil amp; SDM Court, In Front of Awla Farm, Sau Mode, JamwaRamgarh, Jaipur, Rajasthan (303109)User meta

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